शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

आदिवासियों की भलाई के नाम पर नक्सली

माओवादी दंपती ने किया ममता के आगे समर्पण

कोलकाता [जागरण ब्यूरो]। जंगलमहल की खूंखार माओवादी कमांडर जागरी बास्के व उसके पति राजाराम सोरेन ने गुरुवार को राइटर्स बिल्डिंग स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया। वे बिना हथियार के पांच वर्ष के अपने बेटे के साथ राइटर्स बिल्डिंग पहुंचे और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिले। दोनों के खिलाफ हत्या के आठ मामले दर्ज हैं। जागरी फरवरी, 2010 में सिल्दा ईएफआर [ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स] कैंप पर हुए हमले में भी शामिल थी, जिसमें 21 जवान शहीद हुए थे। मुख्यमंत्री ने मुख्यधारा में लौटने पर दोनों का स्वागत किया। दोनों के बेटे बहादुर की कक्षा 12 तक की मुफ्त पढ़ाई व सरकार द्वारा घोषित पैकेज देने का आश्वासन दिया।
मुख्यमंत्री और अधिकारियों की उपस्थिति में माओवादी दंपती ने संवाददाताओं से बातचीत में अपनी व्यथा और मंशा जताई। जागरी ने कहा कि 10 वर्ष पहले जब वह 16 वर्ष की थी, तब आदिवासियों की भलाई के नाम पर नक्सली उसे जबरदस्ती अपने साथ ले गए थे। इसके बाद हथियार चलाने व लोगों की हत्या करने का उसे प्रशिक्षण दिया गया। लेकिन जल्द ही उसे माओवादियों की असली मंशा का पता चल गया और उसके बाद से वह उनके बीच से निकलने का मौका देखने लगी। जागरी मूल रूप से झारखंड के सिंहभूम जिले के पटमदा की रहने वाली है, लेकिन उसकी मां का घर पश्चिमी मेदिनीपुर के बेलपहाड़ी इलाके में है। उसने बताया कि माओवादी स्क्वाड में महिलाओं पर अत्याचार होता है। उसका पति राजाराम सोरेन बांकुड़ा का रहने वाला है। दोनों नक्सलियों के एक्शन स्क्वाड के सदस्य थे।
एसएलआर व विस्फोटक मिला
कोलकाता। सुरक्षा बलों ने जंगलमहल में गुरुवार को नक्सलियों के खिलाफ अभियान और तेज कर दिया। पुरुलिया जिले के अलावा पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के कई इलाकों में सुरक्षा बलों ने गश्त की। इस दौरान लालगढ़ और सालबनी के मध्य पूरणपानी नामक जगह से एक सेल्फ लोडिंग राइफल [एसएलआर] और विस्फोटक पदार्थ बरामद हुआ।

Source:Dainik Jagran

 

सोमवार, 18 जुलाई 2011

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

खून-खराबे के पर्याय कम्युनिस्ट

नंदीग्राम से लेकर सिंगुर और नक्सलबाड़ी से लेकर कंधमाल, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के चंद्रपुर और केरल में हिंसा का नंगा नाच करने में हमारे कम्युनिस्ट माहिर हैं. कहीं पर वह नक्सलवाद का रूप धर लेता है तो कहीं विनायक सेन या तीस्ता जावेद सेतलवाड या अरुंधती सुजैन राय जैसा मानवाधिकारवादी का चोला पहन लेता है. वह नेतागिरी ही नहीं बल्कि एनजीओ से लेकर मीडिया और साहित्य तक में घुसपैठ कर लेता है.

नेपाल और कश्मीर में वह आजादी की पैरवी करता है लेकिन मिस्र (इजिप्त) में तानाशाहों की बदहाली से इतना डर जाता है कि अपने चीन में फेसबुक और गूगल पर पाबंदी लगा देता है. इस डर से कि कहीं आम जनता इन माध्यमो से जग ना जाए और उसकी तानाशाही को चुनौती न दे डाले. उसे विरोध या विपरीत विचारधारा ज़रा भी सहन नहीं होती. कोई उसकी पोल खोले तो यह उसे फासिस्ट घोषित कर देता है. और यही डर और कुत्सित वृत्ति उसे भयानक और हिंसक भी बनाती है.

यह वक्त के सात अपना रूप बदलता है. कहीं जेहादियों से हाथ मिलाता है तो कहीं धर्मान्तरण को उतारू मिशनरियो का हमजोली बनाता है कम्युनिस्ट. लेकिन इसके मूल में हिंसा ही व्याप्त है. इसलिए जहां भी जाता है नरसंहार उसका औजार होता है. कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती एक कलाकृति यहाँ पेश है.